New Delhi: शाजी एन करुण ने अपने करियर की शुरुआत 1970 के दशक में एक सिनेमैटोग्राफर के रूप में की थी। फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII), पुणे से प्रशिक्षित इस युवा कलाकार ने जल्दी ही भारतीय सिनेमा में अपनी अलग पहचान बना ली। मुंबई और केरल में अपने शुरुआती कार्यों के माध्यम से उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गजों का सम्मान अर्जित किया। मुंबई के सेट पर अभिनेत्री हेमा मालिनी निर्देशकों से कहती थीं, “उस युवा की बात सुनो”, जब शाजी अपनी अनोखी लाइटिंग सजेशन्स से सबको चौंका देते थे।
प्रकाश और छाया के जादूगर
1 जनवरी 1952 को केरल के कोल्लम में जन्मे शाजी करुण लाइटिंग के प्रभाव को समझने में सिद्धहस्त थे। उनके कैमरे ने मलप्पुरम के पास बहती भरतपुझा नदी के किनारे की सुस्त धरती को ‘थम्पु’ (1978) जैसी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म में जादुई रूप दिया। उन्होंने अरविंदन की ‘कंचना सीता’, ‘कुम्माट्टी’ और ‘एस्तप्पन’ जैसी फिल्मों में भी अपने कैमरे से कलात्मकता की नई मिसाल पेश की। उनके साथ केजी जॉर्ज की ‘लेखायुदे मरनम ओरु फ्लैशबैक’ और ‘पंचवडी पालम’ भी मलयालम सिनेमा को वैश्विक पहचान दिलाने में सहायक रहीं।
निर्देशन में भी रचा इतिहास
1988 में शाजी करुण ने ‘पीरवी’ से निर्देशन की शुरुआत की। यह फिल्म इमरजेंसी के दौरान पुलिस अत्याचारों पर आधारित थी और लगभग पूरी तरह बारिश में फिल्माई गई थी, जिससे इसकी संवेदनशीलता और बढ़ गई। यह फिल्म 1989 के कान्स फिल्म फेस्टिवल में चयनित हुई और कैमरा डी’ओर स्पेशल मेंशन प्राप्त किया। 1994 में उनकी फिल्म ‘स्वाहम’ को कान्स के मुख्य प्रतियोगिता खंड में प्रदर्शित किया गया—यह उपलब्धि 2024 में पायल कपाड़िया की फिल्म से पहले अंतिम बार किसी भारतीय फिल्म को मिली थी। करुण की सादगी इस बात से जाहिर होती है कि कान्स रेड कार्पेट पर वे धोती-कुर्ता पहनकर पहुंचे थे।
उच्च कलात्मक मानदंड और सादगी का संगम
‘स्वाहम’ की रील्स को लेकर शाजी और उनके मित्र मुंबई के कस्टम ऑफिस पहुंचे थे और कान्स जाने के लिए उन्होंने थिरुवनंतपुरम में रहने वाले एक मित्र से टिकट बुक करवाई थी। वहां वे एक छोटे से होटल में रुके और एशियाई फिल्मकारों के साथ संवाद करते रहे। पायल कपाड़िया की फिल्म के कान्स में चयन के बाद उन्होंने उसे बधाई दी और उसके प्रकाश और ध्वनि की समझ की प्रशंसा की। उन्होंने पायल की जेंडर विषयों पर संवेदनशील व्याख्या को भी विशेष रूप से सराहा।
राष्ट्रीय पुरस्कार और संस्थागत योगदान
शाजी करुण को ‘पीरवी’ के लिए सर्वश्रेष्ठ फिल्म और निर्देशक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। ‘वनप्रस्थम’ को 1999 में और ‘कुट्टी स्रंक’ को 2009 में राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। उनकी अंतिम फिल्म ‘ओलू’, जो एक अंडरवॉटर फैंटेसी थी, सात साल पहले रिलीज़ हुई थी। सरकार ने उनके सिनेमा ज्ञान को मान्यता देते हुए कई कमेटियों में शामिल किया, जिसमें IFFI की टेक्निकल कमेटी भी शामिल है। वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रोजेक्टर मंगवाकर भारतीय फिल्मों के स्तर को नई ऊंचाई देते रहे।
समावेशिता और महिला सशक्तिकरण की मिसाल
केरल सरकार द्वारा 2019 में उन्हें केएसएफडीसी का चेयरमैन नियुक्त किया गया। उन्होंने महिला निर्देशकों की पहली फिल्मों के निर्माण हेतु राज्य सरकार के सहयोग से पहल की। यह देश में पहली बार हुआ जब किसी सरकार ने समावेशिता की दिशा में इतना बड़ा कदम उठाया। बाद में एससी/एसटी समुदायों के निर्देशकों को भी इस योजना से जोड़ा गया। आज केरल में नौ राज्य-स्वामित्व वाले सिनेमाघरों में 17 स्क्रीन हैं। कैंसर से पीड़ित होने के बावजूद वे अंतिम समय तक कार्यालय आते रहे। उनके प्रयासों ने फिल्म उद्योग में एक नया आयाम जोड़ा।
अंतिम विदाई
शाजी करुण अपने पीछे पत्नी अनसूया वारियर, जो एक समाजसेवी हैं, और दो पुत्रों को छोड़ गए हैं। भारतीय सिनेमा उनके योगदान को सदैव याद रखेगा।
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Ms. Pooja, |
