महिला अधिकार की जीत: दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनाया बेटियों को बराबरी देने वाला ऐतिहासिक फैसला

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New Delhi: 22 जुलाई 2025 को माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय ने CS(OS) 78/2023 मामले में एक ऐतिहासिक अंतिम डिक्री सुनाई, जिसे वादी सुनीता कुमारी गणोत्रा द्वारा दायर किया गया था। यह निर्णय संपत्ति कानून के महत्वपूर्ण सिद्धांतों को सुदृढ़ करता है, हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के तहत लैंगिक न्याय को पुनर्स्थापित करता है, और मौखिक बंटवारे व संयुक्त स्वामित्व विवादों से निपटने के लिए एक मिसाल स्थापित करता है। वादी की ओर से अधिवक्ता किरिश गांधी ने पक्ष रखा। यह लेख निर्णय के कानूनी महत्व, प्रमुख तर्कों और न्यायालय द्वारा निर्धारित विधि को विस्तार से प्रस्तुत करता है।

विवाद की पृष्ठभूमि और सम्पत्ति का स्वरूप

वादी द्वारा यह मुकदमा पिता की मृत्यु (वर्ष 2000) के बाद छोड़ी गई संयुक्त संपत्तियों के बंटवारे और स्थायी निषेधाज्ञा की मांग को लेकर दायर किया गया था। उनके पिता ने कोई वसीयत नहीं छोड़ी थी। संपत्तियाँ अभी तक विभाजित नहीं हुई थीं और वादी समेत तीन अन्य कानूनी उत्तराधिकारियों के बीच बराबर (1/4) हिस्सेदारी पहले ही 28.08.2024 की प्रारंभिक डिक्री के माध्यम से घोषित की जा चुकी थी। अब इस अंतिम सुनवाई का उद्देश्य उस डिक्री को लागू करना और वास्तविक बंटवारे के लिए बाध्यकारी निर्देश देना था।

विवादित दो मुख्य संपत्तियाँ थीं:

1. एक आवासीय-कम-वाणिज्यिक भवन (केदार बिल्डिंग)

2. एक वाणिज्यिक संपत्ति (पदम नगर प्रॉपर्टी)

वादी की ओर से प्रमुख प्रस्तुतियाँ

1. मौखिक बंटवारे के दावे को खारिज करना:
अधिवक्ता किरिश गांधी ने दो सह-स्वामियों द्वारा किए गए मौखिक बंटवारे के दावे का कड़ा विरोध किया और कहा कि इसका कोई दस्तावेजी समर्थन नहीं है। उन्होंने Vineet Sharma बनाम Rakesh Sharma (2020) 9 SCC 1 का हवाला देते हुए बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने भी महिलाओं को उनके हिस्से से वंचित करने वाले ऐसे दावों को सिरे से खारिज किया है।

2. पूर्व निर्णयों पर भरोसा:
उन्होंने Veeru Prashad Gupta बनाम Jogeshwari Devi (2018 SCC OnLine Del 10130) का उल्लेख करते हुए बताया कि जब तक कोई विश्वसनीय प्रमाण न हो, तब तक मूल्यवान अचल संपत्ति केवल मौखिक दावे के आधार पर नहीं छीनी जा सकती।

3. महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा:
वादी पक्ष ने हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 की धारा 6 का हवाला देते हुए कहा कि यह कानून बेटियों को समान अधिकार देने के उद्देश्य से बना है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

4. बिक्री या पुनर्विकास के ज़रिए क्रियान्वयन:
अंतिम डिक्री के क्रियान्वयन के लिए अधिवक्ता ने निर्माता के साथ पुनर्विकास या बाजार मूल्य पर बिक्री का व्यावहारिक सुझाव दिया, ताकि अनावश्यक देरी रोकी जा सके।

माननीय न्यायालय के निर्देश और अंतिम आदेश

माननीय न्यायालय ने वादी और अन्य सह-स्वामियों की प्रस्तुतियों को स्वीकार करते हुए अंतिम बंटवारा डिक्री पारित की और निम्नलिखित निर्देश दिए:

1. सहयोग समझौते या बिक्री के लिए समय सीमा:

केदार बिल्डिंग के लिए, न्यायालय ने 9 महीने की समयसीमा दी ताकि सह-स्वामी किसी बिल्डर के साथ समझौता कर सकें। यदि यह संभव न हो, तो आपसी सहमति से बिक्री, और असफल होने पर नीलामी का आदेश।

पदम नगर प्रॉपर्टी के लिए, 6 महीने की समयसीमा रखी गई है, जिसके बाद आपसी बिक्री या सार्वजनिक नीलामी का प्रावधान है।

2. निर्धारित समय सीमा से आगे कोई विस्तार नहीं:
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कोई भी विस्तार नहीं दिया जाएगा और यदि समझौता नहीं हुआ, तो संपत्तियों को बेचना ही होगा।

3. डेवलपर से मिलने वाले लाभों का समान वितरण:
कोई भी भौतिक या वित्तीय लाभ सभी चार सह-स्वामियों में समान रूप से बांटा जाएगा।

4. असहयोग पर बेदखली की कार्यवाही:
यदि कोई सह-स्वामी बंटवारे के क्रियान्वयन में बाधा डालता है, तो डिक्री को अचल संपत्ति की वसूली की तरह लागू किया जा सकेगा।

5. स्टांप शुल्क और अनुपालन:
डिक्री पर लगने वाला स्टांप शुल्क सभी पक्षों द्वारा समान रूप से वहन किया जाएगा।

6. मौखिक बंटवारे के दावे की वापसी:
न्यायालय ने विरोधी पक्षों द्वारा मौखिक बंटवारे के दावे की वापसी को रिकॉर्ड पर लिया और पुनः पुष्टि की कि संपत्तियाँ संयुक्त ही बनी रहेंगी।

फैसले का कानूनी महत्व और प्रभाव

यह निर्णय कई कारणों से मार्गदर्शक और ऐतिहासिक है:

महिलाओं के संपत्ति अधिकारों की पुनः पुष्टि: यह स्पष्ट करता है कि कानूनी उत्तराधिकार को केवल भौतिक कब्जे के आधार पर नकारा नहीं जा सकता।

मौखिक बंटवारे की मनगढ़ंत दलीलों पर रोक: अदालत ने दस्तावेजी साक्ष्यों की आवश्यकता को दोहराते हुए झूठे दावों पर कड़ा संदेश दिया है।

आधुनिक और व्यावहारिक क्रियान्वयन: यह डिक्री साफ़ समय-सीमा और व्यावहारिक तरीकों से वास्तविक बंटवारे को सुनिश्चित करती है।

समान न्याय की गारंटी: कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि दो सह-स्वामी अपनी संपत्ति से वंचित थे और अंतिम डिक्री के माध्यम से न्याय को व्यवहारिक रूप में भी लागू किया।

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Pooja Kumari Ms. Pooja,
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