कानून की बारीकियों को अदालत में सिद्ध कर दिखाया किरिश गांधी ने, महिला को दिलाया संपत्ति में बराबरी का हक

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New Delhi : दिल्ली उच्च न्यायालय ने CS(OS) 78/2023 में एक लंबे समय से चले आ रहे पारिवारिक विवाद का निपटारा करते हुए अंतिम बंटवारा डिक्री पारित की है और यह दोहराया है कि यदि मौखिक बंटवारे का दावा दस्तावेजी साक्ष्यों से सिद्ध नहीं होता, तो यह सह-स्वामियों, विशेषकर महिला उत्तराधिकारियों — के वैधानिक अधिकारों को नकार नहीं सकता।

विवाद की पृष्ठभूमि और मुख्य मुद्दा

यह वाद श्रीमती सुनीता कुमारी गणोत्रा की ओर से दायर किया गया था, जिसमें उन्होंने अपने स्वर्गीय पिता द्वारा छोड़ी गई पैतृक अचल संपत्तियों के बंटवारे और स्थगन का अनुरोध किया था। उनके पिता की मृत्यु बिना वसीयत के हुई थी। इस मामले का मुख्य प्रश्न यह था कि क्या कुछ प्रतिवादियों द्वारा किया गया मौखिक बंटवारे का दावा उन्हें संयुक्त संपत्तियों में एक-चौथाई हिस्से से वंचित कर सकता है।

कानूनी दलीलें और न्यायालय में प्रस्तुत उदाहरण

वादी की ओर से अधिवक्ता श्री क्रिश गांधी ने तर्क दिया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 में हुए संशोधन के बाद, मौखिक बंटवारे के दावे के लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक कठोर साक्ष्य मानक आवश्यक हैं। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय विनीत शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) 9 SCC 1 का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि ऐसे बंटवारे को “ठोस, त्रुटिरहित और समकालीन दस्तावेजी साक्ष्यों” से सिद्ध किया जाना चाहिए।

इसके साथ ही, उन्होंने वीरु प्रसाद गुप्ता बनाम जोगेश्वरी देवी (2018) का उदाहरण भी दिया, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि यदि मौखिक बंटवारे का दावा सार्वजनिक अभिलेखों द्वारा समर्थित नहीं है, तो वह उच्च मूल्य की शहरी संपत्तियों में सह-स्वामित्व को नकारने के लिए पर्याप्त नहीं है।

अदालत का निष्कर्ष और न्यायिक टिप्पणी

न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए कहा कि मौखिक बंटवारे का दावा किसी विश्वसनीय साक्ष्य पर आधारित नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केवल कब्जा ही सभी सह-स्वामियों के समान कानूनी अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता। न्यायालय ने रिकॉर्ड पर मौजूद परित्याग पत्रों का भी उल्लेख किया, जो दर्शाते हैं कि संपत्तियों का कभी औपचारिक रूप से बंटवारा नहीं हुआ था।

संपत्ति के बंटवारे की प्रक्रिया और समयसीमा

22 जुलाई 2025 को पारित अंतिम डिक्री के तहत, न्यायालय ने निर्णय सुनाया कि सभी चार पक्षों को संयुक्त संपत्तियों में समान एक-चौथाई हिस्सा प्राप्त होगा। इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने एक समयबद्ध प्रक्रिया भी निर्धारित की:

पहली संपत्ति के पुनर्विकास हेतु 9 महीने की अवधि दी गई, जिसमें सभी पक्ष किसी डेवलपर के साथ सहमति से समझौता करें। विफल होने पर, 3 महीने के भीतर आपसी सहमति या सार्वजनिक नीलामी के माध्यम से बिक्री की अनुमति दी गई।

दूसरी संपत्ति के लिए 6 महीने का पुनर्विकास समय निर्धारित किया गया है, जिसमें भी यही प्रावधान लागू होगा।

इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने कहा कि यदि कोई सह-स्वामी आवश्यक समय पर कब्जा नहीं छोड़ेगा, तो उसे निष्कासन की कार्यवाही का सामना करना पड़ेगा। स्टाम्प शुल्क सभी पक्षों के बीच समान रूप से विभाजित होगा।

विधिक महत्व और भविष्य के लिए प्रभाव

यह निर्णय हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की संशोधित धारा 6(5) की व्याख्या के संदर्भ में एक महत्त्वपूर्ण दिशा-निर्देश प्रदान करता है। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि बिना प्रामाणिक दस्तावेजों के मौखिक बंटवारे की वैधता स्वीकार नहीं की जा सकती।

अधिवक्ता किरिश गांधी ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के प्रामाणिक निर्णयों के आधार पर यह स्थापित किया कि केवल सार्वजनिक और पंजीकृत रिकॉर्ड से समर्थित बंटवारे को ही कानूनी मान्यता मिलनी चाहिए। यह निर्णय विशेषकर शहरी संपत्तियों से संबंधित सह-स्वामित्व और उत्तराधिकार विवादों में एक अहम उदाहरण बनेगा, जहां अनौपचारिक व्यवस्थाएं अक्सर लम्बे समय तक विवाद का कारण बनती हैं। यह भी पुनः स्पष्ट किया गया कि महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए वैधानिक प्रावधान किसी भी अस्पष्ट या अवैध मौखिक दावे से कमजोर नहीं किए जा सकते।

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Pooja Kumari Ms. Pooja,
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