New Delhi: मीनाक्षी पाहुजा का जन्म 1978 में हुआ और उनका बचपन दिल्ली में बीता। तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी मीनाक्षी को तैराकी का जुनून अपने पिता वी.के. पाहुजा से मिला, जो मॉडर्न स्कूल में स्विमिंग सिखाते थे। महज पांच साल की उम्र में उन्होंने प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू किया और नौ साल की उम्र से पहले ही 50 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक में जूनियर नेशनल चैंपियन बन गईं। 1996 में दक्षिण कोरिया के बुसान में आयोजित एशिया पैसिफिक एज ग्रुप स्विमिंग चैंपियनशिप में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए 400 मीटर इंडिविजुअल मेडले में पदक जीता। नेशनल गेम्स में भी वह तीन बार चैंपियन रहीं।
प्रतियोगी तैराकी से लेक्चरर और फिर मैराथन स्विमिंग तक
2001 में प्रतिस्पर्धी तैराकी से संन्यास लेने के बाद मीनाक्षी पाहुजा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के लेडी श्रीराम कॉलेज में फिजिकल ट्रेनिंग की लेक्चरर के तौर पर नई भूमिका संभाली। लेकिन पानी से उनका रिश्ता खत्म नहीं हुआ। अगस्त 2006 में उन्होंने मैराथन और ओपन-वॉटर स्विमिंग की चुनौती स्वीकार की और मुर्शिदाबाद में भागीरथी-हुगली नदी पर 19 किलोमीटर की प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। इसके बाद 2007 में स्विट्जरलैंड की 26.4 किलोमीटर लंबी लेक ज्यूरिख स्विम में उन्होंने हिस्सा लिया और महिला वर्ग में पांचवां स्थान हासिल किया। इस सफर में उनके पिता और दिल्ली यूनिवर्सिटी के तत्कालीन वाइस-चांसलर दीपक पेंटल ने आर्थिक सहयोग भी दिया।
इंग्लिश चैनल की चुनौती, मंजिल से महज 3 किलोमीटर दूर
मीनाक्षी ने इंग्लिश चैनल पार करने की कोशिश दो बार की। 2008 में पहली कोशिश के दौरान उन्होंने डोवर पहुंचने से ठीक एक सप्ताह पहले भागीरथी-हुगली नदी की 81 किलोमीटर लंबी चैंपियनशिप 12 घंटे 27 मिनट में पूरी की, लेकिन समुद्र में तैरने के सीमित अनुभव और सी-सिकनेस के कारण इंग्लिश चैनल में 11 किलोमीटर के बाद उन्हें वापस लौटना पड़ा। 2014 में उन्होंने फिर कोशिश की और 14 घंटे 19 मिनट में करीब 40 किलोमीटर तैरने के बावजूद बदलते ज्वार-भाटे के कारण उन्हें वापस लौटना पड़ा। उस समय वह मंजिल से सिर्फ 3 किलोमीटर दूर थीं। हालांकि ये प्रयास सफल नहीं हुए, लेकिन उनकी दृढ़ता ने उन्हें ओपन-वॉटर स्विमिंग की दुनिया में अलग पहचान दिलाई।
कई अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियां और रिकॉर्ड
मीनाक्षी पाहुजा ने कई ऐसी उपलब्धियां हासिल कीं, जो भारतीय तैराकी के लिए गौरव की बात हैं। वह फ्लोरिडा के की वेस्ट के आसपास तैरने और टेक्सास में लेक ट्रैविस सोलो पूरा करने वाली पहली भारतीय बनीं। इसके अलावा वह टेक्स रॉबर्टसन हाइलैंड लेक्स चैलेंज पूरा करने वाली पहली भारतीय भी हैं, जिसमें पांच दिनों में पांच झीलों—लेक बुकानन, इंकस लेक, लेक LBJ, लेक मार्बल फॉल्स और लेक ट्रैविस—में तैरना शामिल था। उन्होंने 2012 की लाबुआन सी क्रॉस में कांस्य पदक और 2014 की मैनहट्टन आइलैंड मैराथन स्विम में तीसरा स्थान हासिल किया। आल्प्स की लेक कॉन्स्टेंस पार करने वाली पहली भारतीय तैराक के तौर पर उनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज है।
खेल से आगे भी समाज के लिए आवाज, मिला नारी शक्ति सम्मान
मीनाक्षी पाहुजा ने ओपन-वॉटर स्विमिंग की चार बड़ी चुनौतियों—मौसम, समुद्री जीव-जंतु, शारीरिक सहनशक्ति और मानसिक मजबूती—को रेखांकित किया है। अपने खेल सफर के साथ उन्होंने भारतीय, खासकर महिला खिलाड़ियों के लिए बेहतर सरकारी और सामाजिक समर्थन की जरूरत उठाई। वह Break The Taboo. Period शॉर्ट फिल्म की सह-निर्माता भी रहीं और दिव्यांग बच्चों के लिए स्कूलों में बेहतर सुविधाओं की वकालत की। कोविड-19 के दौरान उन्होंने भारतीय तैराकों के लिए प्रशिक्षण सुविधाओं की बेहतर उपलब्धता की मांग को भी मजबूती से उठाया। उनके खेल, सामाजिक योगदान और महिला सशक्तिकरण के प्रयासों को सम्मान देते हुए 2018 में तत्कालीन राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने उन्हें नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया। मीनाक्षी पाहुजा की कहानी सिर्फ रिकॉर्ड और पदकों की नहीं, बल्कि असफलताओं के बावजूद लगातार आगे बढ़ते रहने और दूसरों के लिए रास्ता बनाने की कहानी है।
××××××××××××××
Telegram Link :
For latest news, first Hand written articles & trending news join Saachibaat telegram group
https://t.me/joinchat/llGA9DGZF9xmMDc1
![]() |
Ms. Pooja, |
