आज अगर ध्यानचंद होते तो अपने स्वागत सत्कार में मनाए जा रहे खेल दिवस पर क्या कहते? शायद यह कहते कि मुझे भारत रत्न क्यों नहीं दिया? क्यों एक क्रिकेटर को समय से पहले भारत रत्न बना दिया और मुझे किताबों, अख़बारों, किस्से कहानियों और खेल मैदानों में टंगी फोटो बना कर रख दिया? आखिर यह खिलाडी दिवस किसलिए?
लेकिन वह शायद ऐसा नहीं कह पाते l एक गरीब परिवार में जन्मे सीधे सच्चे इंसान और हॉकी कला के दिग्गज से विरोध की उम्मीद कदापि नहीं थी l यही कारण है कि सालों बीत जाने के बाद भी उन्हें भारत रत्न जैसा सम्मान नहीं मिल पाया l हाँ, क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर जरूर यह सम्मान पा गए l हालांकि दोनों के बीच तुलना का सवाल ही पैदा नहीं होता l दोनों अपने खेलों के महानायक रहे हैँ l लेकिन जब जब यह देश मेजर ध्यानचंद के नाम का इस्तेमाल खेल की राजनीति चमकाने, सरकारी पैसे को बहाने और भारतीय खेलों की झूठी तस्वीर पेश करने के लिए करता है तो भारतीय हॉकी के इतिहास पुरुष की याद अनायास ही हो आती है l
देश के खेल आकाओं ने दद्दा का एक और जन्मदिवस मना लिया l संयोग से 29 अगस्त इस बार तब आया जबकि भारतीय हॉकी खोई हुई प्रतिष्ठा को समेटने में लगी है l लेकिन वर्ल्ड कप में पुरुष टीम का आठवां और महिलाओं का पांचवा स्थान ध्यानचंद की आत्मा को सुकून पहुँचाने वाला कदापि नहीं है l ध्यानचंद की हॉकी जादूगरी से भारत ने लगातार तीन ओलिंपिक गोल्ड जीते l उन्हें दुनिया का आल टाइम ग्रेट आँका गया l लेकिन आज भारतीय हॉकी की हालत इतनी ख़राब हो चुकी है कि हॉकी प्रेमी ध्यानचंद के जन्मदिवस को भी भूल गए हैँ l खबर है कि खेल मंत्रालय के जादूगरों ने हॉकी जादूगर को याद किया और कुछ करीबियों के साथ हॉकी खेली l बहुत अच्छा किया l अब आपको ही खेलना है l खिलाड़ी तो खेलना भूल चुके हैँ l वर्ल्ड कप जीते 52 साल बीत गए हैँ और ओलम्पिक स्वर्ण का मुंह 46 साल से नहीं देख पाए l वाकई हॉकी का बेताज बादशाह, ध्यानचंद का लाडला देश तरक्की कर रहा है l
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
