भारत ने विश्व योगासन चैंपियनशिप में 102 स्वर्ण सहित 114 पदक जीतकर दुनिया को चौंका दिया है। अहमदाबाद में आयोजित इस प्रतियोगिता में भारत ने ऐसा परचम लहराया कि बाकी देशों के हिस्से सिर्फ सांत्वना पुरस्कार ही आए । जापान 11 और अर्जेंटीना मात्र 5 पदकों के साथ बहुत पीछे रह गए। यदि पदक तालिका को पैमाना मान लें तो भारत अब योग का अमेरिका और चीन बन गया है, जिनका ओलंपिक men खेलों में डंका बजता हैl
लेकिन जरा ठहरिए।
यह वही भारत है जो ओलंपिक खेलों में आज भी एक-एक पदक के लिए तरसता है। यह वही भारत है जहाँ करोड़ों लोग मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, मोटापा, कुपोषण और मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं। यह वही देश है जहाँ अस्पतालों के बाहर कतारें खत्म नहीं होतीं, जहाँ सरकारी अस्पतालों में बिस्तर कम पड़ जाते हैं और जहाँ बीमारी एक सामाजिक पहचान बनती जा रही है। ऐसा क्यों हो रहा है? यदि योग में हम पारंगत हैं तो देश कैसे बीमार है? दुनिया का सबसे बड़ा योग गुरु होने का दावा करने वाला भारत बीमारियों के सामने लाचार क्यों है? क्यों हमारे खिलाड़ी स्वस्थ शरीर होने के बावजूद तमाम खेलों में पिछड़ रहे हैं?
यदि योग ने भारत को इतना स्वस्थ, संतुलित और अनुशासित बना दिया है तो फिर अस्पतालों में मेला क्यों लगा रहता है? क्यों हम चैंपियन खिलाड़ी पैदा नहीं कर पा रहे?
बेशक, योग भारत की अमूल्य धरोहर है। इसमें कोई विवाद नहीं। लेकिन धरोहर और खेल में अंतर होता है। योग का मूल उद्देश्य मनुष्य को स्वस्थ, संतुलित और जागरूक बनाना है; पदक मशीन तैयार करना नहीं। योग को खेल बनाने में कोई बुराई नहीं, लेकिन जब खेल का तमगा योग के मूल दर्शन पर भारी पड़ने लगे तो बहस जरूरी हो जाती है।
विडंबना देखिए—जिस देश में 80 करोड़ लोग मुफ्त राशन योजना पर निर्भर हैं, जहाँ बड़ी आबादी पौष्टिक भोजन से वंचित है, जहाँ बच्चों में कुपोषण और युवाओं में मोटापा साथ-साथ बढ़ रहे हैं, वही देश योगासन के स्वर्ण पदकों की शतकीय पारी पर जश्न मना रहा है। है ना कमाल!
निस्संदेह भारत ने योगासन प्रतियोगिता जीती है। बधाई दी जानी चाहिए। आयोजक, प्रायोजक, योगी, साधक सभी बधाई के पात्र हैं lलेकिन असली विश्व विजय उस दिन होगी जब अस्पतालों की भीड़ कम होगी, दवाइयों की बिक्री घटेगी, मधुमेह और हृदय रोग के आँकड़े नीचे आएँगे और भारतीय समाज वास्तव में स्वस्थ दिखाई देगा।तब 102 स्वर्ण पदकों से कहीं बड़ी उपलब्धि हमारे सामने होगी।
फिलहाल तो ऐसा लगता है कि हम योगासन में विश्व चैंपियन हैं, लेकिन स्वास्थ्य के मैदान में अब भी क्वालीफाइंग राउंड खेल रहे हैं। यदि हम वाकई स्वस्थ शरीर के मालिक होते तो हमारा दिमाग़ भी स्वस्थ होता l सिर्फ कबड्डी, खो खो और योगासन में ही नहीं हॉकी, फुटबाल, तैराकी, एथलेटिक, जूडो, कुश्ती, मुक्केबाजी, बास्केटबॉल, वॉलीबॉल आदि खेलों में भी हम ओलंपिक पदक विजेता होते l हालंकि कबड्डी, खो खो और योगासन को ओलंपिक खेलो में शामिल होने के लिए लम्बा सफर तय करना है l
![]() |
Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
