भारतीय फुटबाल आज अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है l इसलिए क्योंकि पिछले कुछ सालों से गोल ज़माने वाले खिलाड़ी निकल कर नहीं आ रहे हैँ l हालांकि फुटबाल में हर पोजीशन पर विशेषज्ञ खिलाड़ियों की जरुरत है लेकिन जब तक गोल ज़माने वाले एक दो महारथी टीम में नहीं होंगे तो मैच जीतने या प्रदर्शन में सुधार की कोई गारंटी नहीं l इसलिए क्योंकि , फुटबाल में ‘गोल’ ही सबकुछ है और हार जीत के लिए गोल की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है l इस कसौटी पर भारतीय फुटबाल को कसा जाए तो गोल भारतीय फुटबाल की सबसे कमजोर कड़ी है l क्योंकि हमारे खिलाड़ी और खासकर फारवर्ड गोल ज़माने में पारंगत नहीं हैँ l परिणामस्वरुप हमें मैच दर मैच
हार का सामना करना पड़ता है l
पिछले कुछ दशकों में भारतीय फुटबाल के प्रदर्शन पर नज़र डालें तो इन्दर सिँह, मगन सिँह, शाबिर अली, नरेन्द्र गुरंग, विजयन, बाईचूंग भूटिया, सुनील क्षेत्री आदि खिलाड़ियों ने क्लब, राष्ट्रीय स्तर और अंतराष्ट्रीय मुकाबलों में गोल ज़माने की कला का बखूबी प्रदर्शन किया l लेकिन आज की भारतीय फुटबाल में एक भी खिलाड़ी ऐसा नहीं है जिसे गोल जमाने में पारंगत कहा जा सके l यही कारण है कि विभिन्न आयुवर्गों में भारतीय टीमों को हार दर हार का सामना करना पड़ता है l यही हाल सीनियर महिला – पुरुष टीमों का है l बेशक़, फुटबाल एक टीम खेल है l सभी खिलाड़ियों के बीच बेहतर तालमेल जरुरी है l गोल कीपर, मध्य पंक्ति, और फॉरवर्ड के संतुलित खेल से ही गोल निकल पाते हैँ l एक भी कड़ी कमजोर पड़ती है तो सारा खेल बिगड़ जाता है l लेकिन कुछ खिलाड़ी गोल ज़माने की कलाकारी में महारथी होते हैं l ऐसे खिलाड़ियों का भारतीय फुटबाल में अकाल सा पड़ गया है l.राष्ट्रीय टीम के लिए देश विदेश में भारतीय मूल के खिलाड़िओं की खोज करने वाले देश के फुटबाल आकाओं कोचों और फेडरेशन अधिकारियों को यदि सचमुच भारतीय फुटबाल की चिंता है तो सबसे पहले गोल ज़माने की कला के कुछ महारथियों को तैयार किया जाए बाकी सब गोल माल है l
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
