जब थम गई धड़कनें और फिर मिली राहत
पिछले कुछ समय से हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर जो तनाव बना हुआ था उसने पूरी दुनिया की सांसें अटका दी थीं। आप ऐसे समझ लीजिए कि यह रास्ता दुनिया की तेल वाली नस है अगर यहाँ रुकावट आती है तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को दिल का दौरा पड़ सकता है। लेकिन अब जैसे ही ईरान ने इस रास्ते को पूरी तरह खोलने का संकेत दिया और युद्धविराम की खबरें आईं तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ताश के पत्तों की तरह ढह गईं। यह गिरावट महज एक आंकड़ा नहीं है बल्कि उस डर का अंत है जो हम सबको सता रहा था।
आपकी और हमारी जेब पर सीधा असर
जब हम अखबार में पढ़ते हैं कि ब्रेंट क्रूड के दाम गिर गए तो शायद सीधा जुड़ाव महसूस न हो। लेकिन सोचिए जब कच्चा तेल सस्ता होता है तो सबसे पहले वह आपके शहर के पेट्रोल पंप तक पहुँचता है। अगर यह गिरावट कुछ समय तक टिकी रही तो पेट्रोल और डीजल के दाम कम होना तय है। इसका सीधा मतलब है कि महीने का जो बजट तेल के चक्कर में बिगड़ा हुआ था वह थोड़ा संभल जाएगा।
महंगाई के मोर्चे पर ठंडी हवा का झोंका
भारत के लिए यह खबर किसी वरदान से कम नहीं है। हम अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल बाहर से मंगवाते हैं। जब तेल महंगा होता है तो ट्रक का भाड़ा बढ़ता है और उसका सीधा असर टमाटर दाल और रोजमर्रा के सामान की कीमतों पर पड़ता है। अब चूंकि तेल की कीमतों में गिरावट आई है तो उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले दिनों में बाजार में सामान के दाम थोड़े स्थिर होंगे। यह भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक संजीवनी की तरह है क्योंकि इससे सरकार का खर्च घटेगा और वह पैसा देश के विकास में लग पाएगा।
एक उम्मीद भरा भविष्य
कुल मिलाकर देखें तो हॉर्मुज का खुलना सिर्फ कूटनीति की जीत नहीं है बल्कि एक आम भारतीय उपभोक्ता की जीत भी है। शेयर बाजार में हरियाली और मध्यम वर्ग के चेहरे पर मुस्कान इसी बात का संकेत है कि अब शायद हम महंगाई के उस दौर से बाहर निकल रहे हैं जिसने लंबे समय से परेशान कर रखा था। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस गिरावट का फायदा कितनी जल्दी आम जनता तक पहुँचाती है।
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