पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद हाल ही में एक ऐसी ऐतिहासिक कूटनीतिक हलचल का केंद्र बनी, जिसकी कल्पना कुछ समय पहले तक असंभव मानी जा रही थी। अमेरिका और ईरान के शीर्ष प्रतिनिधियों के बीच हुई यह 21 घंटे की मैराथन बैठक मध्य पूर्व में दशकों से चले आ रहे तनाव को समाप्त करने का एक बड़ा प्रयास था। हालांकि दुनिया भर की उम्मीदों के विपरीत यह वार्ता किसी ठोस नतीजे पर पहुंचे बिना ही समाप्त हो गई। इस असफलता ने न केवल अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिज्ञों को निराश किया है बल्कि वैश्विक राजनीति में एक बार फिर अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। इस महत्वपूर्ण वार्ता के विफल होने के पीछे कई गहरे और जटिल कारण मौजूद हैं।
परमाणु कार्यक्रम और संवर्धन की कठोर शर्तें
वार्ता की मेज पर सबसे बड़ी बाधा ईरान का परमाणु कार्यक्रम रहा। अमेरिका ने स्पष्ट किया कि वह किसी भी कीमत पर ईरान को परमाणु हथियार बनाने की क्षमता हासिल नहीं करने देगा। अमेरिकी प्रतिनिधियों ने यूरेनियम संवर्धन की प्रक्रिया को पूरी तरह रोकने और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों को असीमित पहुंच देने की मांग की। दूसरी ओर, ईरान ने अपने संप्रभु अधिकारों का हवाला देते हुए इन शर्तों को मानने से इनकार कर दिया। ईरान का तर्क था कि उसका कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण ऊर्जा उद्देश्यों के लिए है और वह परमाणु तकनीक पर अपने हक का त्याग नहीं करेगा। दोनों देशों के बीच यह वैचारिक मतभेद वार्ता के पहले कुछ घंटों में ही स्पष्ट हो गया था।
क्षेत्रीय संघर्ष और इजरायल का प्रभाव
इस्लामाबाद में जब बातचीत चल रही थी तब मध्य पूर्व का जमीनी हालात तनावपूर्ण बना हुआ था। लेबनान और गाजा में जारी संघर्ष ने वार्ता की भावना को बुरी तरह प्रभावित किया। ईरान ने मांग की कि अमेरिका अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर इजरायली हमलों को तुरंत रुकवाए। चूंकि इजरायल इस द्विपक्षीय वार्ता का हिस्सा नहीं था और उसने अपनी सुरक्षा नीतियों में किसी भी बदलाव से इनकार कर दिया था इसलिए ईरान को लगा कि अमेरिका केवल एकतरफा रियायतें चाह रहा है। इस क्षेत्रीय अस्थिरता ने वार्ता के वातावरण में कड़वाहट भर दी।
जब्त संपत्ति और आर्थिक प्रतिबंधों का पेंच
ईरान के लिए इस वार्ता का प्राथमिक लक्ष्य अपनी अर्थव्यवस्था को प्रतिबंधों के जाल से बाहर निकालना था। ईरान ने अपनी विदेशों में फ्रीज की गई अरबों डॉलर की संपत्ति को तत्काल मुक्त करने की शर्त रखी। अमेरिकी प्रशासन पर घरेलू राजनीति और कांग्रेस का भारी दबाव था कि वे बिना किसी स्थायी परमाणु समझौते के ईरान को आर्थिक राहत न दें। जब अमेरिका ने संपत्ति की मुक्ति को भविष्य के व्यवहार से जोड़ने की कोशिश की तो ईरान ने इसे अपने आर्थिक हितों के खिलाफ माना और बातचीत से हाथ पीछे खींच लिए।
रणनीतिक जलमार्ग और समुद्री सुरक्षा का विवाद
एक अन्य प्रमुख कारण हॉर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक रास्तों पर नियंत्रण को लेकर रहा। अमेरिका चाहता था कि ईरान इन मार्गों पर अंतरराष्ट्रीय जहाजों की सुरक्षा की गारंटी दे और अपनी सैन्य गतिविधियों को सीमित करे। इसके विपरीत ईरान ने इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बताते हुए स्पष्ट किया कि वह अपनी समुद्री सीमाओं पर किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेगा। रणनीतिक वर्चस्व की इस लड़ाई ने समझौते की किसी भी संभावना को धूमिल कर दिया।
विश्वास की कमी और कड़ा राजनीतिक नेतृत्व
सबसे बड़ा कारण दोनों देशों के बीच दशकों पुराना अविश्वास रहा। वार्ता के दौरान एक तरफ कूटनीतिक संवाद चल रहा था तो दूसरी तरफ दोनों देशों के नेतृत्व की ओर से सार्वजनिक रूप से सख्त बयानबाजी जारी थी। अमेरिका के कड़े रुख और ईरान के अडिग रवैये ने मध्यस्थों के लिए भी कोई रास्ता नहीं छोड़ा। 21 घंटे की लगातार चर्चा के बाद यह स्पष्ट हो गया कि दोनों पक्ष एक-दूसरे पर भरोसा करने के लिए अभी तैयार नहीं हैं जिससे यह ऐतिहासिक अवसर हाथ से निकल गया।
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