संसद के ऊपरी सदन यानी राज्यसभा में जब नए सांसद शपथ लेते हैं, तो यह सिर्फ एक रस्म नहीं होती बल्कि देश की बड़ी राजनीति का एक नया चैप्टर होता है। इस बार महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्यों से जो नए चेहरे सदन में आए हैं, उन पर हर किसी की नजर टिकी है। महाराष्ट्र का मामला तो वैसे ही आजकल काफी चर्चा में रहता है क्योंकि वहां की राजनीति में पिछले कुछ समय में बहुत कुछ बदला है। अब वहां से जो सांसद दिल्ली पहुंचे हैं उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वे अपने राज्य के हितों और वहां की जनता की उम्मीदों को केंद्र सरकार के सामने कितनी मजबूती के साथ रख पाते हैं।
बिहार और अन्य राज्यों का सियासी समीकरण
वहीं अगर बिहार की बात करें तो वहां के नेताओं का अपना एक अलग अंदाज़ होता है। बिहार से आए नए सांसदों के लिए राज्यसभा एक ऐसा मंच होगा जहां वे राज्य के विकास और पुरानी अटकी हुई मांगों को नए सिरे से उठा सकते हैं। सिर्फ यही दो राज्य नहीं बल्कि यूपी और कर्नाटक जैसे राज्यों से आए प्रतिनिधि भी अब अगले छह सालों के लिए देश की कानून बनाने वाली सबसे बड़ी पंचायत का हिस्सा बन गए हैं। जब ये नए माननीय सदन में अपनी बात रखेंगे तो जाहिर है कि बहस में एक नई ऊर्जा और नए तर्क देखने को मिलेंगे।
सदन की बदली हुई तस्वीर और आम आदमी की उम्मीदें
राज्यसभा में नंबरों का खेल हमेशा से अहम रहा है और इन नए सदस्यों के आने से सदन का पूरा गणित ही बदल गया है। सरकार को अपने जरूरी बिल पास कराने के लिए अब इन नए साथियों की राय और समर्थन की जरूरत पड़ेगी। असली बात तो ये है कि राज्यसभा में शोर से ज्यादा संजीदगी की उम्मीद की जाती है और ये नए चेहरे इस उम्मीद पर कितना खरा उतरते हैं यह आने वाला वक्त ही बताएगा। अंत में बस यही कह सकते हैं कि इन सांसदों का असली काम भाषण देना नहीं बल्कि उस आखिरी इंसान की आवाज़ बनना है जिसे लगता है कि उसकी बात दिल्ली तक नहीं पहुंच रही है। अब देखना होगा कि शपथ लेने के बाद ये माननीय सदन की गरिमा और जनता के भरोसे को किस तरह आगे ले जाते हैं।
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