‘कल्याण’ आईएसएल से नहीं, ग्रास रूट से होगा

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अखिल भारतीय फुटबाल फेडरेशन ने एलान कर दिया है कि आई एस एल 2025- 26 का बिगुल बजने को है और सभी 14 टीमों के भाग लेने की पुष्टि हो गई है l भले ही कुछ खिलाड़ियों की मैच फीस घट सकती है लेकिन लीग हो कर रहेगी, क्योंकि ऐसा देश की सरकार और खासकर खेल मंत्रालय चाहता है l देश की श्रेष्ठ लीग की फिर से शुरुआत की खबर से आईएसएल क्लबों, खिलाड़ियों और क्लब मालिकों का खुश होना समझ आता है लेकिन सवाल यह पूछा जा रहा है कि अन्य खेलों के प्रति सरकार इतनी गंभीर क्यों नहीं है? खेल मंत्री का फुटबाल बचाव के लिए बीच में कूदना, पेशेवर क्लबों को समझाना और खिलाड़ियों की फरियाद सुनना अपने आप में बड़ा उदाहरण है l लेकिन बहुत से ऐसे खेल हैं जिनमे सालों से जंगल राज चल रहा है l उनकी तो कोई खबर नहीं लेता l

सरकार से मान्यता प्राप्त और भारतीय ओलम्पिक संघ के सदस्य खेलों में आधे से अधिक ऐसे हैं जिनमे सालों से विवाद चल रहे हैं l उनके विवाद तब खुलकर सामने आते हैं जब एशियाड और ओलम्पिक नज़दीक आते हैं l उम्मीद है खेल मंत्री और उनका मंत्रालय ऐसे खेलों पर भी गौर करेगा l लेकिन आईएसएल की वापसी के यह मायने नहीं हैं कि भारतीय फुटबाल के तमाम विवाद हल हो गए हैंl भले ही देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित आयोजन में देश विदेश के बड़े नाम वाले खिलाड़ी भाग लेते हैं लेकिन जब तक ग्रासरूट स्तर पर सुधार नहीं किया जाता, स्कूल और कॉलेज स्तर पर सुधार नहीं होता राष्ट्रीय टीम का स्तर सुधरना मुश्किल है l ऐसे में आईएसएल का आयोजन महज छलावा और दिखावा रह जाता है l ऐसा इसलिए भी है क्योंकि आईएसएल में देश विदेश के ज्यादातर ऐसे खिलाड़ी भाग लेते हैं जिनका फुटबाल करियर लगभग ढलान पर होता है या अपना श्रेष्ठ पीछे छोड़ आते हैं l वरना क्या कारण है कि हमारे तथाकथित स्टार खिलाड़ी जब कभी देश के लिए खेलते हैं भारतीय फुटबाल को कुछ और जख्म दे जाते हैं l

हालांकि भारतीय फुटबाल प्रेमियों ने फुटबाल से लगभग नाता तोड़ लिया है, स्टेडियम जाना छोड़ दिया है लेकिन उम्मीद की जा रही है कि आईएसएल को एक और मौका देने से हालात सुधर जाएंगे l फ़िरभी आम फुटबाल प्रेमी, फुटबाल जानकार और पूर्व खिलाड़ी चाहते हैं कि फुटबाल आका ग्रास रुट पर अधिकाधिक ध्यान दें l तब कहीं जा कर ही भारतीय फुटबाल का कल्याण हो सकता है l वरना कल्याण चौबे के पास कोई कल्याणकारी योजना बची नहीं है l आईएसएल के चले हुए फुस्स कारतूसों से भरोसा कब का उठ चुका है l चलिए एक बाजी और सही l

Rajender Sajwan Rajender Sajwan,
Senior, Sports Journalist
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