खेल मंत्री की भूल चूक, लेनी देनी!

Mansukh L. Mandaviya

जो व्यक्ति भारतीय फुटबाल और खासकर आईएसएल को पटरी पर लाने के लिए हर संभव प्रयास में जुटा है उसका मज़ाक़ उड़ाना कहाँ तक ठीक है? देश में फुटबाल लगभग शमशान के द्वार तक पहुँच गई थी l फेडरेशन, उसके लुटेरे पदाधिकारियों, बर्बाद फुटबाल के तथाकथित स्टार खिलाड़ियों, स्वार्थी क्लब अधिकारीयों और फुटबाल प्रेमियों ने अपनी फुटबाल की मौत का फरमान जारी कर दिया था l लेकिन पता नहीं कहाँ से एक व्यक्ति देवदूत बन कर आया और उसने ऐसा जादू किया कि भारतीय फुटबाल (लीग ) की वापसी की उम्मीद फिर से जगने लगी है l बेशक़, यह भला इंसान कोई और नहीं 150 करोड़ की आबादी वाले देश का खेल मंत्री है l लेकिन उसकी कोशिश और भागीरथ प्रयास की हंसी उड़ाई जा रही है l

हुआ यह कि आईएसएल की वापसी खटाई में पड़ गई थी l लाख कोशिशों के बाद भी जब कोई हल नहीं निकला तो खेल मंत्री मनसुख मांडवीया ने आगे बढ़ कर कमान संभाली l पेशेवर क्लबों, फेडरेशन और वरिष्ठ खिलाड़ियों से बात की और दिन रात मेहनत कर लीग की वापसी का मार्ग प्रशस्त किया l लेकिन जवाब में उन्हें हंसी का पात्र बना दिया गया l प्रेस कांफ्रेंस में जानकारी देने का उनका एक वीडियो ऐसा वायरल हुआ कि लोग और खासकर फुटबाल प्रेमी और खिलाड़ी हंस हंस कर लोट पोट हो रहे हैं l हंसी का पात्र इसलिए बने क्योंकि उन्होंने मोहन बागान को मोहन बेगन और ईस्ट बंगाल को ईस्ट बेगन पढ़ा, जिसका मीडिया और फुटबाल हलकों में मज़ाक बनाया जा रहा है l कुछ हंसोड़े और जुमलेबाज तो बेगन को ‘बैंगन’ भी कह रहे हैं l
देश के फुटबाल प्रेमी मोहन बागान और ईस्ट बंगाल को भली भांति जानते पहचानते हैं l भारतीय फुटबाल में इन दोनों ही वलबों का योगदान बड़ा रहा है l एक वक्त वह भी था जब राष्ट्रीय टीम के ज्यादातर खिलाड़ी इन क्लबों से होकर निकलते थे l कुछ तो यहाँ तक कहते थे कि कोलकाता के इन दो बड़े क्लबों के लिए खेलना देश के लिए खेलने से भी बड़ा है l लेकिन खेल मंत्री इन क्लबों का नाम लेते हुए चूक गए l शायद उन्होंने पर्याप्त होमवर्क नहीं किया होगा l बस विपक्ष और फुटबाल के मारों को बहाना चाहिए था और खेल मंत्री के खेल ज्ञान पर सवाल खडे कर दिए गए l लेकिन इन सवालों का इसलिए कोई मायना नहीं क्योंकि खेल मंत्री कभी नामवर खिलाड़ी नहीं रहे और उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि फिलहाल सीख रहे हैं और चूंकि मोदी जी ने उन्हें दाइत्व सौंपा है इसलिए उसका ईमानदारी से निर्वाह करेंगे l
सीधा सा मतलब है कि आजादी के सालों बाद भी इस देश की सरकारों ने खेलों को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया l स्वर्गीय सुनील दत्त और उमा भारती जी को खेल मंत्रालय सौपना भी सवालों के घेरे में रहा था l लेकिन दोनों ने देश के खिलाड़ियों और खेल प्रशासन को शिकायत का मौका नहीं दिया l डूबती भारतीय फुटबाल को खेल मंत्री बचा पाएंगे? इस सवाल का जवाब वक्त ही देगा l

Rajender Sajwan Rajender Sajwan,
Senior, Sports Journalist
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