“पता नहीं खेल मंत्री जी के हाथ कौन सी जादू की छड़ी लग गई है, जिसके चमत्कार से वे भारतीय फुटबॉल की समस्या का समाधान निकाल देंगे,” एक पूर्व खिलाड़ी की यह टिप्पणी काबिलेगौर है। उनके अनुसार हमारी फुटबॉल का फिलहाल कोई ठोस इलाज नहीं खोज पाया है। विदेशी और स्वदेशी सभी कोच आजमाए जा चुके हैं लेकिन बीमारी है कि बढ़ती ही जा रही है।
भले ही मंत्री जी ने फुटबॉल को रसातल में पहुंचाने वाले ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (एआईएफएफ), उसके भ्रष्ट अधिकारियों, आईएसएल, आई-लीग, कमर्शियल पार्टनरों और अन्य की बात सुनी और आश्वासन दिया कि गतिरोध जल्दी ही समाप्त कर दिया जाएगा। लेकिन भारतीय फुटबॉल की असली बीमारी फिर से पकड़ से बाहर रह गई। हैरानी वाली बात यह है कि बैठक में फुटबॉल के प्रकांड पंडितों ने भाग लिया, अपना-अपना ज्ञान बघारा लेकिन किसी ने भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की फुटबॉल की थू-थू के बारे में बात नहीं की। यह नहीं बताया कि क्यूं हमारी फुटबॉल पिछले पचास सालों से लगातार नीचे लुढ़क रही है? क्यों हमारी राष्ट्रीय टीम जीतना भूल गई है। पूर्व खिलाड़ी, कोच और अनुभवी फुटबॉल प्रेमी जानते हैं कि “उम्र की धोखाधड़ी और चयन में धांधली” भारतीय फुटबॉल का राष्ट्रीय चरित्र बन गया है। स्कूल, कॉलेज, क्लब और राज्य स्तर पर हजारों बूढ़े और जर्जर खिलाड़ी असल प्रतिभाओं को रौंद रहे हैं। उन्हें आगे बढ़ने से पहले ही खेल छोड़ने पर विवश किया जा रहा है। देश के सबसे लोकप्रिय स्कूल फुटबॉल टूर्नामेंट ‘सुब्रत कप’ में 22 स्कूली टीमों और सैकड़ों खिलाड़ियों की धरपकड़ और टूर्नामेंट बाहर किए जाने का उदाहरण सामने है। इतना ही नहीं हाल ही में ईरान को हराने वाली 17 साल के खिलाड़ियों की टीम पर भी उंगली उठाई जा रही है, जिसकी पड़ताल जरूरी है।
जाने-माने पूर्व खिलाड़ियों की माने तो ज्यादातर की राय में आईएसएल और आईलीग जैसे आयोजन बेमतलब हैं। ऐसे आयोजनों का फायदा कुछ विदेशी खिलाड़ियों और राष्ट्रीय टीम को सेवाएं देने से कतराने वाले अपने अवसरवादी क्लबों और खिलाड़ियों को पहुंच रहा है, जिनके चलते संतोष ट्रॉफी राष्ट्रीय फुटबॉल चैम्पियनशिप मजाक बनकर रह गई है। अर्थात् ताजा गतिरोध का हल खोजने से ही भारतीय फुटबॉल ट्रैक पर नहीं लौटेगी। असर बीमारी तो जस की तस बनी रहेगी, मंत्री जी! कृपया ग्रास रूट और एज फ़्रॉड का पक्का इलाज करें l
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
