“आजादी के 75 साल बीत जाने के बाद भी अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआईएफएफ) के अध्यक्ष पद पर कोई नॉर्थ ईस्ट का व्यक्ति नहीं बैठ पाया है। इसलिए मैं सोचता हूं कि अगला अध्यक्ष नॉर्थ ईस्ट से होना चाहिए,” पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बाईचुंग भूटिया ने यह प्रतिक्रिया व्यक्त कर उनके अंदर छिपी लालसा को प्रदर्शित किया है। यह भी हो सकता है कि बाईचुंग वर्तमान अध्यक्ष कल्याण चौबे और उनकी टीम के काम से संतुष्ट नहीं है और बदलाव चाहते हैं।
बेशक, देश भर में फेडरेशन में भारी बदलाव की जोर-शोर से मांग की जा रही है। कल्याण चौबे के अध्यक्ष पद संभालने के बाद भी भारतीय फुटबॉल का पतन नहीं रुक पाया है। मैच दर मैच गिरती रैंकिंग के साथ देश की फुटबाल का मान-सम्मान और प्रतिष्ठा भी गिर रही है। लाख प्रयास करने के बाद भी हालात सुधरते नजर नहीं आ रहे। कोच बदला और खिलाड़ी भी बदले जा रहे हैं लेकिन चौबे साहब चैन की बंसी बजा रहे हैं। ऐसे में भूटिया के विचार का महत्व है।
भारतीय फुटबॉल के अब तक के अध्यक्षों पर सरसरी नजर डालें तो मोईन उल हक पहले अध्यक्ष थे। 1950 से 1960 और तत्पश्चात् 1975 तक क्रमश: पंकज गुप्ता और महेंद्र नाथ दत्ता रे पद पर रहे। सही मायने में यही भारतीय फुटबॉल का स्वर्णिम दौर था। एशियाड में जीत और ओलम्पिक में शानदार प्रदर्शन ने भारत को पहचान दिलाई। नारुल आमीन (1975-80) और जियाउद्दीन (1980-88) के अध्यक्ष रहते कुछ एक उपलब्धियां अर्जित की लेकिन प्रियरंजन दासमुंशी का 20 साल का लंबा कार्यकाल खासा भारी पड़ा। अंतत: प्रफुल्ल पटेल ने 2009 में फेडरेशन की सत्ता संभाली और 2022 तक के 13 सालों में फुटबॉल को सुधारने की बजाय टोने-टोटके और ओझाओं की झाड़-फूंक के हवाले कर दिया। नौबत यह आ गई है कि कल्याण चौबे से गिरावट का सिलसिला नहीं थामा जा रहा। हालांकि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि बाईचुंग फुटबॉल को पटरी पर ला देंगे लेकिन उन्हें या नॉर्थ ईस्ट के किसी अधिकारी को अध्यक्ष बनाने में कोई बुराई नहीं है। हालांकि चयन बहुमत के आधार पर होगा और भूटिया पहले भी चौबे से हार चुके हैं। लेकिन उनके पास चौबे से ज्यादा फुटबॉल समझ और रिकॉर्ड है। तो फिर एक दाव और सही!
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
