कैसे 150 करोड़ पर 5 लाख भारी?

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गरीबी, भुखमरी, कुपोषण और भ्रष्टाचार के शिकार छह अफ्रीकी देशों मिस्र, मोरक्को, घाना, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया और केपवर्ड की फुटबॉल टीमों ने 2026 के फीफा वर्ल्ड का टिकट पा लिया है। दूसरी बड़ी खबर यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला भारत महान महाद्वीप के सबसे प्रतिष्ठित एएफसी टूर्नामेंट की दौड़ से बाहर हो गया है। उसे निचली रैंकिंग वाले सिंगापुर ने उसी के घर पर हरा दिया l इस प्रकार ‘खेल महाशक्ति’ बनने का दम भरने वाले देश को एक बार फिर फुटबॉल ने शर्मिंदा कर दिया।

भारतीय फुटबॉल की गिरती साख को लेकर जब कभी पूर्व खिलाड़ियों से बात हुई तो अधिकतर की राय में देश की फुटबॉल का हाल राजनीति जैसा हो गया है। गलत और स्वार्थी लोग दलगत राजनीति में घुसपैठ कर गए हैं और यही हाल देश के खेलों का है, जिनकी बागडोर अवसरवादियों के हाथों में है l यही लोग तमाम खेलों का सत्यानाश करने पर तुले हैं। अफसोस की बात यह है कि पूरे अफ्रीका महाद्वीप की आबादी भी भारत के बराबर नहीं है। लेकिन बीस से अधिक अफ्रीकी देश फुटबॉल विश्व कप की दावेदारी में शामिल रहे हैं।

सवाल अफ्रीकी देशों के साथ तुलना का नहीं है। अफसोस इस बात का है कि लाखों-करोड़ों खर्च करने के बाद भी भारतीय फुटबॉल अपने लाखों चाहने वालों की कसौटी पर खरी नहीं उतर पा रही। अथक प्रयास करके देख लिया। देसी, विदेशी और फिर देसी कोच आजमाए जा चुके हैं लेकिन फीफा रैंकिंग में पिछड़े देश भी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की फुटबॉल की फजीहत कर रहे हैं। इसलिए क्योंकि फुटबॉल ‘भी’ सही हाथों में नहीं है। गंदी राजनीति यहां भी हावी है। अंधभक्तों को चाहिए कि तुलना का खेल बंद कर फुटबॉल को राजनीति के गुंडातंत्र से मुक्त किया जाए।

फीफा रैंकिंग में पिछड़ा हर ऐरा-गैरा भारतीय फुटबॉल की हवा निकाल डालता है। एशिया कप में खेल नहीं सकते, एशियाड में भाग लेने के लिए चोर दरवाजे का इस्तेमाल करते हैं और देशवासियों के खून पसीने की कमाई को मरी-गिरी फुटबॉल पर बर्बाद करते हैं। ऐसा क्यों और कब तक चलेगा? पूछता है भारत। पूछते हैं देश के लाखों-करोड़ों खिलाड़ी व फुटबॉल प्रेमी। बेशक़ अफ़्रीकी देशों ने भारतीय फुटबाल के गाल पर जोर का तमाचा जड़ा है l

Rajender Sajwan Rajender Sajwan,
Senior, Sports Journalist
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