सलमान खान की ‘सिकंदर’ फ्लॉप, निर्देशक एआर मुरुगदास ने बताया हैरान करने वाला कारण

Salman Khan

बॉलीवुड के भाई जान और सुपरस्टार सलमान खान एक ऐसे एक्टर है जो केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरे देश में लोकप्रिय है। न जाने कितने ब्लॉकबस्टर फिल्म सलमान खान ने इस इंडस्ट्री को दिया है। हाल ही में सलमान खान की फिल्म सिकंदर रिलीज हुई थी जिसमें उनके साथ मुख्य किरदार में साउथ एक्ट्रेस रश्मिका मंडाना थी।लेकिन सलमान खान की फिल्म ‘सिकंदर’ को लेकर दर्शकों और फिल्म इंडस्ट्री को काफी उम्मीदें थीं, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म बुरी तरह फेल हो गई। अब रिलीज़ के लगभग चार महीने बाद फिल्म के निर्देशक एआर मुरुगदास ने चुप्पी तोड़ी है और इसके असफल होने का एक चौंकाने वाला कारण सामने रखा है। उनके मुताबिक, भाषा की समझ की कमी इस फ्लॉप का बड़ा कारण रही।

गजनी से सिकंदर तक का सफर

2008 में आमिर खान स्टारर गजनी जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्म देने के बाद जब एआर मुरुगदास ने सलमान खान के साथ सिकंदर की घोषणा की, तो उम्मीद जताई गई थी कि यह फिल्म भी इतिहास रचेगी। लेकिन नतीजा उम्मीदों के एकदम उलट रहा। दर्शकों को कहानी और भावनाओं से जुड़ाव महसूस नहीं हुआ और फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह लड़खड़ा गई। आमिर खान की करियर के वन ऑफ़ द मोस्ट ब्लॉकबस्टर फिल्म में से एक गजनी फिल्म है। गजनी को पेन से बहुत ज्यादा प्यार मिला था और अभी भी मिल रहा है। आमिर खान बॉलीवुड के दिक्कत कलाकारों में से एक है जिन्होंने न जाने बॉलीवुड को कितनी ब्लॉकबस्टर फिल्में दी है। आमिर खान एक ऐसे एक्टर है जो लाखों करोड़ों फैंस के दिल पर राज करते हैं।

मातृभाषा की ताकत और अनुवाद की कमजोरी

अपनी आगामी फिल्म ‘मदरासी’ के प्रमोशन के दौरान मुरुगदास ने ‘सिकंदर’ की असफलता पर खुलकर बात की। उन्होंने साफ कहा कि हिंदी भाषा को पूरी तरह न समझ पाने के कारण वह स्क्रिप्ट के भावनात्मक पहलुओं को उतनी गहराई से नहीं पकड़ पाए। मुरुगदास का कहना है कि जब कोई फिल्म निर्माता अपनी मातृभाषा में काम करता है, तो उसे न केवल संवादों पर पकड़ होती है, बल्कि दर्शकों की नब्ज पर भी नियंत्रण होता है। लेकिन जैसे ही भाषा बदली जाती है, वह सहजता खत्म हो जाती है। सिकंदर फिल्म रिलीज होने के बाद उसे दशकों से उतना प्यार नहीं मिला। जिसे लेकर फिल्म के निदेशक ने कहा कि वह हिंदी भाषा को ठीक से समझ नहीं पाए जिस कारण वह स्क्रिप्ट में उसे तरह की इमोशंस और भावनाओं को अच्छे तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाए।उन्होंने बताया कि आमतौर पर वह पहले स्क्रिप्ट को अपनी भाषा में तैयार करते हैं, फिर उसे अंग्रेजी में अनुवादित किया जाता है और अंत में हिंदी में। इस दौरान भाव और संदर्भ कहीं न कहीं खो जाते हैं। यही वजह है कि दर्शकों के साथ वह जुड़ाव नहीं बन पाया जिसकी फिल्म को जरूरत थी।निर्देशक ने स्वीकार किया कि हिंदी फिल्म बनाते समय उन्हें अक्सर यह महसूस होता है कि वे किसी अनजान ज़मीन पर काम कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यह स्थिति किसी अपाहिज व्यक्ति जैसी हो जाती है, जिसके पास सब कुछ होते हुए भी वह सही तरह से काम नहीं कर पाता। मुरुगदास का मानना है कि फिल्म की असली ताकत उसकी सांस्कृतिक जड़ें होती हैं और जब कोई अपनी संस्कृति से दूर जाकर फिल्म बनाता है, तो उसका असर सीधे कंटेंट पर पड़ता है।

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