इस साल का मानसून सत्र शुरू हो चुका है। संसद में मानसून सत्र के शुरू होते ही। पक्ष विपक्ष दोनों एक दूसरे पर हमलावर है। अब इस बीच संसद का मानसून सत्र अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। कांग्रेस पार्टी ने अपने लोकसभा सांसदों को कड़ा निर्देश देते हुए आगामी तीन दिनों तक सदन में अनिवार्य उपस्थिति सुनिश्चित करने को कहा है। यह व्हिप ऐसे समय में जारी किया गया है जब संसद में पहलगाम में हुए आतंकी हमले और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा होनी है। ये दोनों मामले सीधे तौर पर देश की सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़े हुए हैं, इसलिए कांग्रेस इस बहस को गंभीरता से लेने के मूड में है।इस बहस को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही पूरी तरह सक्रिय नजर आ रहे हैं। संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—में वरिष्ठ नेताओं की भागीदारी तय मानी जा रही है। भाजपा नीत एनडीए सरकार जहां आतंकवाद के खिलाफ अपनी नीतियों को मजबूती से रखने की तैयारी में है, वहीं विपक्ष सरकार की कथित विफलताओं और खामियों को उजागर करने के लिए रणनीति बना चुका है।
प्रधानमंत्री की भागीदारी पर अटकलें तेज
जब से मानसून सत्र शुरू हुआ है। तब से रोजाना संसद से जुड़ी खबरें सुर्खियों में रहती है। पक्ष विपक्ष एक दूसरे पर हमलावर है। सभी पार्टी के कार्यकर्ता एक दूसरे पर कई मुद्दों को लेकर सवाल खड़े करते हैं और उनसे जवाब मांगते हैं। अब इसी कड़ी में सूत्रों की मानें तो इस चर्चा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस. जयशंकर जैसे दिग्गज नेता सरकार का पक्ष रखेंगे। वहीं इस बात की भी अटकलें हैं कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस बहस में हस्तक्षेप कर सकते हैं। अगर प्रधानमंत्री इसमें शामिल होते हैं तो यह बहस और भी गंभीर और निर्णायक रूप ले सकती है, क्योंकि उनका बयान न केवल सरकार का दृष्टिकोण साफ करेगा बल्कि विपक्ष को भी कड़ी चुनौती देगा।सत्र की शुरुआत अपेक्षाकृत अशांतिपूर्ण रही थी। विपक्ष ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और अन्य राजनीतिक मुद्दों को लेकर लगातार विरोध जताया, जिससे संसद की कार्यवाही बार-बार बाधित हुई। लेकिन अब दोनों पक्षों के बीच बनी सहमति के तहत सोमवार को लोकसभा और मंगलवार को राज्यसभा में 16-16 घंटे की लंबी बहस प्रस्तावित है। माना जा रहा है कि यह बहस वास्तविकता में और अधिक समय तक चल सकती है।
बहस के केंद्र में ऑपरेशन सिंदूर और पहलगाम हमला
इसी साल पहलगाम में आतंकी हमले में भारत के कई मासूम लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इसके बाद भारत ने जवाबी कार्रवाई करते हुए ऑपरेशन सिंदूर के तहत दुश्मन देश को धूल चटा दिया था। अब संसद में मानसून सत्र के दौरान ऑपरेशन सिंदूर और पहलगाम आतंकी हमले को लेकर भी विपक्ष सवाल खड़े कर रहे हैं।‘ऑपरेशन सिंदूर’ और पहलगाम में हुआ हालिया आतंकी हमला इस बहस का मुख्य विषय बने हुए हैं। इन घटनाओं ने देश की सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया एजेंसियों की भूमिका को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं। विपक्ष इस मौके को सरकार की नीतियों की आलोचना के तौर पर देख रहा है, जबकि केंद्र सरकार इसे अपने सुरक्षा रुख को स्पष्ट करने और जनता को आश्वस्त करने का मंच मान रही है।अब देखना यह होगा कि यह बहस केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रह जाती है या देश की सुरक्षा नीति को लेकर कुछ ठोस सुझाव और सुधारात्मक विचार सामने आते हैं। पूरे देश की निगाहें इस बहुप्रतीक्षित बहस पर टिकी हैं, जो आने वाले दिनों में देश की सुरक्षा रणनीति की दिशा तय कर सकती है।
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