बिहार में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण के दौरान सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े

Bihar Election

बिहार में विधानसभा चुनाव इसी साल होने जा रहा है। चुनाव को लेकर पूरे राज्य में हलचल का माहौल है।सभी पार्टी के लोग चुनाव की तैयारी में जुड़े हुए हैं। इस बीच विधानसभा चुनाव से पहले बिहार में मतदाता सूची का पुनरीक्षण चल रहा है। जिसे लेकर विपक्षियों ने कई सवाल भी खड़े किए थे। अब इससे जुड़ी बड़ी खबर सामने आ रही है।बता दे की इसी बीच मंगलवार को चुनाव आयोग ने इस मुद्दे पर तीन बड़े अपडेट साझा किए हैं। आयोग के मुताबिक, अब तक की समीक्षा में राज्य में 18 लाख ऐसे मतदाता पाए गए हैं, जिनकी मृत्यु हो चुकी है। वहीं 26 लाख से अधिक मतदाता ऐसे हैं जो अब किसी दूसरे विधानसभा क्षेत्र में स्थानांतरित हो चुके हैं। इसके अलावा 7 लाख से ज्यादा मतदाता ऐसे मिले हैं, जिनके नाम दो अलग-अलग स्थानों पर दर्ज हैं।

हर मतदाता तक पहुंचने की कोशिश

चुनाव आयोग ने यह भी साफ किया है कि वह अपने बूथ स्तर के अधिकारी और राजनीतिक दलों के बूथ एजेंट्स के माध्यम से हर योग्य मतदाता तक पहुंचने का प्रयास कर रहा है, ताकि 1 अगस्त को प्रकाशित होने वाली अंतिम मतदाता सूची में किसी भी पात्र मतदाता का नाम छूटने न पाए। इससे पहले शनिवार को आयोग ने जानकारी दी थी कि राज्य में करीब 42 लाख मतदाता अपने पते पर नहीं मिले हैं, जबकि 7.5 लाख से अधिक लोगों के नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज हैं।इस पूरे घटनाक्रम के बीच आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान को सही ठहराते हुए इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखने की दिशा में एक जरूरी कदम बताया है। आयोग ने बताया कि बिहार में यह प्रक्रिया 24 जून से शुरू की गई थी और इसी के आधार पर देशभर में SIR अभियान को निर्देशित किया गया है।

SIR के खिलाफ याचिका पर दिया विस्तृत हलफनामा

बिहार में चुनाव से पहले मतदाता सूची का पुनर निरीक्षक को लेकर विपक्षियों ने कई सवाल खड़े किए थे। इसके अलावा इसके खिलाफ याचिका भी दायर की थी। बता दे की SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर जवाब देते हुए चुनाव आयोग ने कोर्ट में अपना विस्तृत पक्ष रखा है। आयोग ने स्पष्ट किया कि वह SIR-2025 के दौरान केवल पहचान के सीमित उद्देश्य के लिए आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड जैसे दस्तावेजों पर विचार कर रहा है। आयोग के अनुसार, इस पुनरीक्षण का मुख्य उद्देश्य अपात्र मतदाताओं को सूची से हटाना और चुनावी प्रक्रिया को निष्पक्ष व पारदर्शी बनाना है।आयोग ने अपने हलफनामे में संविधान के अनुच्छेद 326, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धाराओं 16 और 19 तथा 1951 के अधिनियम की धारा 62 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया है कि केवल वे नागरिक ही मतदान के हकदार हैं जो भारतीय नागरिक हों, उचित उम्र और सामान्य निवास की शर्तें पूरी करते हों। आयोग का कहना है कि जो व्यक्ति इन शर्तों को पूरा नहीं करता, वह मतदान का अधिकारी नहीं हो सकता और ऐसे में उसे अनुच्छेद 19 या अनुच्छेद 21 का हवाला देने का भी अधिकार नहीं बनता।राजनीतिक दलों द्वारा इस प्रक्रिया पर उठाए जा रहे सवालों के बीच चुनाव आयोग ने साफ कर दिया है कि SIR की प्रक्रिया न केवल वैध है, बल्कि इससे लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा होती है। आयोग ने यह भी दोहराया कि किसी भी योग्य मतदाता को सूची से बाहर नहीं किया जाएगा, और पुनरीक्षण पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ किया जा रहा है।

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