फुटबॉल: नारी शक्ति जिंदाबाद और …मुर्दाबाद!

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एएफसी एशियन कप में भारतीय महिला टीम के शानदार प्रदर्शन से देश की फुटबॉल की जैसे रंगत बदल गई। फुटबॉल फैंस, खिलाड़ी और हर मोर्चे पर फ्लॉप साबित हुई अखिल भारतीय फुटबॉल फेडरेशन (एआईएफएफ) ढोल नगाड़ों के साथ महिला टीम के के प्रदर्शन से रोमांचित है। हर किसी की जुबान पर बस एक ही बात है कि अब महिला टीम विश्व कप खेलने के लिए तैयार है। कोई कह रहा है कि महिलाओं ने नया इतिहास रच दिया है तो कुछ एक पुरुष टीम को बुरा-भला कह रहे हैं। उसके कोचों, खिलाड़ियों और एआईएफएफ को जम कर लतिया रहे हैं।
बेशक, पुरुष टीम खिलाड़ी, कोच और उन्हें शह देने वाली फेडरेशन को जितना भी कोसा जाए कम होगा। पुरुषों ने भारतीय फुटबॉल की प्रतिष्ठा और इज्जत को तार-तार कर दिया है। ऐसे में महिलाओं की उपलब्धि को कदापि कमतर नहीं आंका जाना चाहिए। सभी लड़कियां, टीम प्रबंधन और कोच साधुवाद के पात्र हैं और सबसे ज्यादा सम्मान व धन्यवाद के हकदार हैं उनके माता-पिता जो कि देश में जंगलराज के बावजूद अपनी बेटियों को घर से बाहर भेज रहे हैं, उन्हें पुरुष प्रधान खेल से जोड़े हुए हैं।

सालों बाद भारतीय फुटबॉल किसी खुशखबरी से जुड़ी है। इसलिए फुटबॉल प्रेमी, पत्रकार और भारतीय फुटबॉल के माई-बाप बार-बार कह रहे हैं कि महिलाओं ने इतिहास रच दिया है, जबकि ऐसा नहीं है। सच तो यह है कि 1970 और 80 के दशक में भारतीय महिला फुटबॉल बेहतर स्थिति में थी। 1979 और 1983 में एशियन कप में उप-विजेता रही टीम अब 2026 के एशियन कप में भाग लेने वाली 12 टॉप टीमों में शामिल हो गई है, जहां से महिला वर्ल्ड कप 2027 का रास्ता नजदीक है लेकिन बहुत मुश्किल नजर आता है। याद रहे कि 2013 में हमारी लड़कियां फीफा रैंकिंग में 49वें स्थान पर थीं। फिलहाल 70वें नंबर पर हैं।

लेकिन इस आंकड़ेबाजी से महिला खिलाड़ियों को जरा भी डरने की जरूरत नहीं है। जरूरत इस बात की है कि खिलाड़ी अति उत्साह में पड़ कर अपना असल खेल भूल न जाएं। उन्हें संयम बनाए रखना होगा। यह भी जरूरी है कि देश की फुटबॉल को बर्बाद करने वाले कालर खड़े नहीं करेंगे। महिलाओं ने उन्हें मुंह दिखाने का मौका दिया है। उम्मीद है कि इस मौके को हाथ से नहीं जाने देंगे।

Rajender Sajwan Rajender Sajwan,
Senior, Sports Journalist
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