महाराष्ट्र की राजनीति में एक अनोखा क्षण देखने को मिल रहा है। जब शिवसेना (यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकरे एक ही मंच पर नजर आए।यह आयोजन मुंबई के वर्ली स्थित एनएससीआई डोम में आयोजित ‘विजय रैली’ के रूप में हो रहा है, जो न केवल राजनीतिक समीकरणों को नई दिशा दे रहा है, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान को लेकर उठे एक विवाद के जवाब में भी देखा जा रहा है। बता दे कि यह रैली महाराष्ट्र सरकार के उस फैसले की वापसी के विरोध में नहीं, बल्कि समर्थन में हो रही है जिसमें पहली से पांचवीं कक्षा तक के बच्चों को हिंदी अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाने की योजना बनाई गई थी। सरकार ने भारी विरोध के बाद यह प्रस्ताव को वापस ले लिया, जिसे क्षेत्रीय भाषाई अस्मिता की जीत के रूप में देखा जा रहा है। इसी को रेखांकित करते हुए इस आयोजन को ‘विजय रैली’ नाम दिया गया है।
मंच पर किसी भी पार्टी का झंडा नहीं हैं,
इस रैली की खास बात यह है कि मंच पर किसी भी पार्टी का झंडा नहीं दिखेगा, जिससे यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि यह आंदोलन किसी दल विशेष का नहीं, बल्कि समूचे महाराष्ट्र की सांस्कृतिक अस्मिता का है। इस आयोजन के जरिए मराठी भाषा के पक्ष में एकजुटता दिखाई जा रही है और यह संकेत भी दिया जा रहा है कि कुछ मुद्दे दलगत राजनीति से ऊपर होते हैं।हालांकि, इस आयोजन से कांग्रेस ने स्वयं को अलग कर लिया है। पार्टी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह ठाकरे बंधुओं की इस पहल का हिस्सा नहीं बनेगी। यह निर्णय महा विकास आघाड़ी (MVA) के भीतर संभावित दरार की ओर इशारा करता है, जहां शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (शरद पवार गुट) एक ओर दिखाई दे रहे हैं, वहीं कांग्रेस ने अपने अलग रुख से कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
सुप्रिया सुले की उपस्थिति से शरद पवार गुट का समर्थन स्पष्ट..
एनसीपी (शरद पवार गुट) की वरिष्ठ नेता और सांसद सुप्रिया सुले इस रैली में भाग लेंगी, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि यह गुट ठाकरे बंधुओं की इस साझा मुहिम का समर्थन कर रहा है। सुले की उपस्थिति को विपक्षी एकता के एक भावनात्मक पहलू के रूप में देखा जा रहा है, जो इस रैली को केवल भाषाई मुद्दे तक सीमित नहीं रहने देती।इस ऐतिहासिक मंच साझा करने पर भाजपा ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। पार्टी के विधायक रवि राणा ने रैली पर निशाना साधते हुए कहा कि उद्धव ठाकरे भविष्य में राज ठाकरे को धोखा दे सकते हैं। उन्होंने दोनों नेताओं के अतीत के रिश्तों की याद दिलाते हुए इसे केवल एक ‘राजनीतिक नाटक’ करार दिया।राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि उद्धव और राज ठाकरे इस अवसर पर अपने चाचा और शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे को एक साथ श्रद्धांजलि देने जा सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो यह ठाकरे परिवार की वर्षों बाद सार्वजनिक एकता का एक प्रतीकात्मक और भावुक क्षण होगा।
हिंदी भाषा का समर्थन,
यह रैली केवल एक सरकारी फैसले के विरोध या समर्थन में नहीं देखी जा रही, बल्कि इसे मराठी अस्मिता और सांस्कृतिक चेतना के रूप में भी जोड़ा जा रहा है। वर्षों से मराठी भाषा को लेकर महाराष्ट्र में भावनाएं प्रबल रही हैं, और इस बार हिंदी को अनिवार्य बनाए जाने के प्रस्ताव ने उस असंतोष को फिर से उभारा, जिसने दो राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को एक साथ ला खड़ा किया।अब सभी की निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या यह साझा मंच केवल एक विशेष मुद्दे तक सीमित रहेगा या आने वाले समय में यह ठाकरे बंधुओं के बीच किसी दीर्घकालीन राजनीतिक सहयोग की नींव रखेगा। फिलहाल, यह आयोजन महाराष्ट्र की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है, जो शायद भविष्य में कई नई राजनीतिक राहों की शुरुआत का संकेत भी दे सकता है।
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