50 साल बाद किसने अशोक कुमार को याद किया?

Ashok

भले ही भारतीय हॉकी ने आठ ओलम्पिक खेलों में गोल्ड जीते हैं लेकिन 1975 में विश्व खिताब जीतने वाली उपलब्धि को भारतीय हॉकी के इतिहास में अभूतपूर्व माना जाता है और कप्तान अजितपाल सिंह के नेतृत्व में मलेशिया में खेले गए वर्ल्ड कप की चर्चा आज भी की जाती है। तत्पश्चात भारत ने 1980 के मॉस्को ओलम्पिक खेलों में भी स्वर्ण पदक जीता लेकिन इस जीत को ज्यादा महत्व इसलिए नहीं दिया जाता क्योंकि तब दुनिया के पांच श्रेष्ठ हॉकी राष्ट्रों ने ओलम्पिक का बायकॉट किया था।

क्वालालम्पुर वर्ल्ड कप की मेजबानी और भारत की खिताबी जीत को याद करने के लिए पहांग ( मलेशिया) के राजा ने 50 साल बाद एक समारोह आयोजित किया, जिसमें तत्कालीन हॉकी हस्तियों को याद किया गया lहालांकि विश्व विजेता टीम में एक से बढ़कर एक खिलाड़ी शामिल थे लेकिन पाकिस्तान के विरुद्ध विजयी गोल दाग कर भारत को पहला और अब तक का एकमात्र वर्ल्ड कप खिताब दिलाने वाले भारतीय खिलाड़ी को विशेष तौर पर आमंत्रित किया गया था l साथ ही चौथे स्थान पर रहे मेजबान देश क़े खिलाड़ी भी सम्मान समारोह का हिस्सा बने ।

बेशक़, गोल दागने वाले और भारतीय जीत क़े हीरो अशोक ध्यान चंद थे, जिनके पिता ध्यानचंद भारतीय हॉकी इतिहास के सर्वकालीन श्रेष्ठ खिलाड़ी थे ।

पिता क़े नक़्शे कदम पर चलते हुए अशोक कुमार ने खूब नाम कमाया l उनके जमाए गोल से भारत ने एकमात्र विश्व कप जीता था l यही कारण है कि मलेशिया ने उन्हें पचास साल बाद याद किया ।

वापसी पर अशोक ने मलेशिया में मिले सम्मान को अभूतपूर्व बताया। उनके अनुसार, मेजबान देश ने पचास साल पूरे होने पर हॉकी दिग्गजों को याद किया लेकिन अपने देश में शायद ही किसी को याद होगा कि भारत कभी विश्व विजेता बना था और उस टीम में कप्तान अजितपाल, लेस्ली फर्नांडीज, अशोक दीवान, माइकल किंडो, सुरजीत सिंह, असलम शेर खान, वीरेंद्र सिंह, ओंकार सिंह, फिलिप्स, हरचरण सिंह, पवार, अशोक कुमार, गोविंदा, जसमिंदर चिमनी, कालिया, मोहिंदर सिंह जैसे दिग्गज शामिल थे। महान बलबीर सिंह सीनियर उस टीम के मैनेजर थे और जीएस बोदी ने कोच की भूमिका निभाई। हॉकी जानकारों की राय में यह टीम हॉकी इतिहास की श्रेष्ठतम टीमों में शुमार की जाती है। इस जीत में कप्तान अजितपाल ड्रिब्लिंग में अद्वितीय, अशोक कुमार और रक्षापंक्ति में बेजोड़ असलम शेर खान राष्ट्र नायक के रूप में आज तक याद किए जाते हैं। लेकिन अशोक कुमार को इस बात का अफसोस है कि भारतीय हॉकी पचास सालों में भी इतिहास नहीं दोहरा पाई। लेकिन इस बात का संतोष है कि मलेशिया जैसे देश में आज भी हॉकी क़े चैंपियनों को सम्मानित करने कि परंपरा बरकरार है, जबकि भारत ने अपने विश्वविजेताओं को भुला दिया है ।

Rajender Sajwan Rajender Sajwan,
Senior, Sports Journalist
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