‘भारतीय टेनिस आज कहां खड़ी है,’ इस बारे में जब देश के पूर्व खिलाड़ियों और टेनिस प्रेमियों से पूछा जाता है तो अधिकतर का सीधा जवाब होता है, “भारतीय टेनिस औंधे मुंह पड़ी है।” बेशक, टेनिस प्रेमियों को यह जवाब अटपटा सा लगेगा लेकिन इस कड़वे सच को हमें स्वीकारना पड़ेगा कि दुनिया की 150 करोड़ की आबादी वाले देश के पास इस खेल के पचास ऐसे खिलाड़ी नहीं हैं, जिन्हें भविष्य की उम्मीद कहा जाए। ऐसा क्यों हैं और क्यों टेनिस जैसे लोकप्रिय खेल में भारत का ग्राफ उठने की बजाय लगातार गिरता जा रहा है। एक पूर्व खिलाड़ी के अनुसार, हम ना सिर्फ टेनिस के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं, बल्कि सबसे फिसड्डी राष्ट्र भी कहे जाने लगे हैं।
ओलम्पिक, एशियाड, चार ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट और डेविस कप इस खेल में किसी भी देश और खिलाड़ी की कामयाबी का आईना रहे हैं लेकिन पिछले दो दशकों में भारतीय टेनिस ने विश्व स्तर पर कुछ भी बड़ा नहीं किया है, जिसके बूते यह कहा जा सके कि भारतीय टेनिस सही दिशा में बढ़ रही है। साल 2025 के पहले ग्रैंड स्लैम ऑस्ट्रेलियन ओपन के प्रदर्शन को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारी टेनिस कहां खड़ी है। सुमित नागल पहले राउंड में बाहर हुए, तो डबल्स रोहन बोपन्ना, युकी भांबरी, बालाजी और रित्विक चौधरी की चुनौती विफल रही। अर्थात टेनिस में वापसी की उम्मीद औंधे मुंह गिरी। लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। लगभग दो दशक से भारत का प्रदर्शन लगातार गिर रहा है और देश में एक भी विश्व स्तरीय खिलाड़ी नजर नहीं आता है।
जिस टेनिस को अमीरों का खेल कहा जाता रहा है उसने भारत रामानाथन कृष्णन, प्रेमजीत लाल, जयदीप मुखर्जी, विजय अमृतराज, शशि मेनन, आनंद अमृतराज और रमेश कृष्णन जैसे चैंपियन दिए। तत्पश्चात लिएंडर पेस, महेश भूपति और सानिया मिर्जा ने देश का गौरव बढ़ाया। लेकिन एक बार फिर से भारतीय टेनिस उल्टी चाल चलते-चलते जीरो पर पहुंच गई है। ऐसा क्यों है, भारतीय टेनिस के कर्ताधर्ताओं को अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत है।
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
